रखे हैं नियाज़ ये अहल-ए-दिल, तिरे शेर सुनने का इश्तियाक़ ग़ज़ल एक दूसरी और कह, तुझे हक़ ने फ़िक्र-ए-रसा दिया
— शाह नियाज़ अहमद बरेलवी

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