“He is Himself the seer, He Himself the listener; / None other than Him have I ever beheld.”
वह स्वयं ही देखने वाला है और स्वयं ही सुनने वाला है; मैंने उसके अतिरिक्त किसी अन्य को कभी नहीं देखा है।
यह शे'र सूफ़ी दर्शन के अद्वैत भाव यानी 'वहदत-उल-वुजूद' को बड़े सीधे और गहरे अंदाज़ में बयान करता है। शायर कह रहे हैं कि इस पूरी कायनात में देखने वाली नज़र भी वही खुदा है और सुनने वाला भी वही; उसके सिवा असल में किसी और का कोई वजूद ही नहीं। जब इंसान के दिल से 'मैं' और 'तू' का पर्दा हट जाता है, तो उसे हर ज़र्रे, हर चेहरे और हर आवाज़ में सिर्फ़ उसी एक का नूर महसूस होता है।
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