होता न अगर उस के तमाशे में तहय्युर हैरत से मैं आईना-नमत दंग न होता

“Had there not been sheer bewilderment in the spectacle of that vision, I would not stand dumbstruck in wonder, motionless like a mirror.”

— शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
अर्थ

अगर महबूब के दीदार में इतनी हैरानी न होती, तो मैं हैरत की वजह से आईने की तरह दंग और अवाक न रह जाता।

विस्तार

शायर कहता है कि महबूब का दीदार कोई साधारण नज़ारा नहीं, बल्कि असीमित विस्मय और जादू से भरा एक ऐसा तमाशा है जो देखने वाले की सुध-बुध छीन लेता है। यहाँ 'आईना-नमत' यानी आईने जैसा बन जाने का खूबसूरत रूपक बाँधा गया है—जिस तरह आईना सामने वाले की तस्वीर लेकर खुद चुप, स्तब्ध और पलक झपकाए बिना खड़ा रहता है, ठीक वैसे ही शायर भी उस सौंदर्य को देखकर अवाक और जड़ हो गया है। यह इश्क की वह गहरी कैफियत है जहाँ इंसान हैरत के मारे शब्द भूल जाता है और सिर्फ एक मूक गवाह बन कर रह जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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