घर को तो अपनी हस्ती के वीरान कर नियाज़ हस्ती से हक़ की फिर वो रहेगा बसा हुआ

“Lay desolate the dwelling of your own self, O Niaz; with the presence of the Divine Truth, it shall then forever thrive.”

— शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
अर्थ

ऐ नियाज़, तू अपने वजूद के घर को खाली और वीरान कर दे, ताकि वह परमात्मा (हक़) के अस्तित्व से आबाद और बसा हुआ रह सके।

विस्तार

नियाज़ साहब यहाँ सूफ़ी दर्शन की एक बेहद ख़ूबसूरत बात समझाते हैं—जब तक दिल में 'मैं' यानी अहंकार भरा रहेगा, तब तक ख़ुदा के लिए जगह नहीं बनेगी। वो अपने वजूद को एक घर की तरह देखते हैं और कहते हैं कि इसे अपनी हस्ती और सांसारिक पहचान से खाली कर दो। जब यह घर अपनी झूठी अना से वीरान होगा, तभी इसमें ईश्वर का सच्चा नूर बसेगा और यह हमेशा के लिए आबाद हो जाएगा।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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