ग़ज़ल
यूँ तो न तेरे जिस्म में हैं ज़ीनहार हाथ
یوں تو نہ تیرے جسم میں ہیں زینہار ہاتھ
इस ग़ज़ल में 'हाथ' के रूपक के माध्यम से ईश्वर की असीम कृपा और मानवीय आकांक्षाओं व वासनाओं का सुंदर चित्रण किया गया है। शायर एक ओर जहां परमेश्वर की असीम उदारता का वंदन करता है, वहीं दूसरी ओर मानवीय तड़प, बेचैनी और मय-ओ-इश्क़ की बेबसी को बयां करता है।
Source: rekhta · HI
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1
यूँ तो न तेरे जिस्म में हैं ज़ीनहार हाथ
देने के ऐ करीम मगर हैं हज़ार हाथ
2
अंगड़ाइयों में फैलते हैं बार बार हाथ
शीशा की सम्त बढ़ते हैं बे-इख़्तियार हाथ
3
डूबे हैं तर्क-ए-सइ से अफ़सोस तो ये है
साहिल था हाथ भर पे लगाते जो चार हाथ
4
आती है जब नसीम तो कहती है मौज-ए-बहर
यूँ आबरू समेट अगर हों हज़ार हाथ
5
दरपय हैं मेरे क़त्ल के अहबाब और मैं
ख़ुश हूँ कि मेरे ख़ून में रंगते हैं यार हाथ
6
दामन-कशाँ चली है बदन से निकल के रूह
खिंचते हैं फैलते हैं जो यूँ बार बार हाथ
7
मिटता नहीं नविश्ता-ए-क़िस्मत किसी तरह
पत्थर से सर को फोड़ कि ज़ानू पे मार हाथ
8
साक़ी सँभालना कि है लबरेज़ जाम-ए-मय
लग़्ज़िश है मेरे पाँव में और राशा-दार हाथ
9
मुतरिब से पूछ मसअला-ए-जब्र-ओ-इख़्तियार
क्या ताल सम पे उठते हैं बे-इख़्तियार हाथ
10
मैं और हूँ अलाएक-ए-दुनिया के दाम में
मेरा न एक हाथ न उस के हज़ार हाथ
11
ऐ 'नज़्म' वस्ल में भी रहा तू न चैन से
दिल को हुआ क़रार तो है बे-क़रार हाथ
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