सुब्हा है ज़ुन्नार क्यूँ कैसी कही ज़ाहिद-ए-अय्यार क्यूँ कैसी कही

“The rosary is but an infidel’s sacred thread—well, how was that said? / O sly, scheming ascetic, tell me now—how was that said?”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

मैंने तुम्हारी तसबीह को ज़ुन्नार (जनेऊ) कह दिया, तो कहो कैसी रही? ऐ धूर्त तपस्वी, बताओ मैंने कैसी बात कही?

विस्तार

इस शेर में शायर ने पाखंडी धर्मगुरुओं के खोखले दिखावे पर बहुत ही चुटीला और करारा तंज़ किया है। वे इबादत की तसबीह (सुब्हा) को सीधे ग़ैर-मज़हबी जनेऊ (ज़ुन्नार) के बराबर ठहरा देते हैं, यानी अगर दिल में खुदा का सच्चा प्यार न हो तो यह माला सिर्फ ढोंग है। 'क्यूँ कैसी कही' का शोख़ अंदाज़ ऐसा है मानो कोई दोस्त भरी महफ़िल में मक्कार ज़ाहिद को आईना दिखाकर मुस्कुराते हुए पूछ रहा हो कि 'कहो, कैसी लगी!'

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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