हक़ से तालिब दीद के हों हम बसीर ऐसे नहीं हम को जो कोतह-नज़र समझें वो ना-बीना हैं आप

“We claim not such exalted sight to deign to view the Divine; yet those who deem my vision short are blind to light and sign.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

हम इतने दिव्य दृष्टि वाले नहीं हैं कि ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन का दावा करें, लेकिन जो हमें संकीर्ण दृष्टि वाला समझते हैं वे स्वयं दृष्टिहीन हैं।

विस्तार

इस शेर में शायर बड़ी ख़ूबसूरती से अपनी आजिज़ी और आत्मसम्मान के बीच संतुलन साधता है। वह साफ़ कहता है कि वह इतना बड़ा ज्ञानी या 'बसीर' नहीं कि ख़ुदा के दीदार का दावा करे, मगर इसका मतलब यह कतई नहीं कि उसकी नज़र कमज़ोर है। दूसरा मिसरा उन छिछले आलोचकों पर सीधा वार करता है—शायर कहता है कि जो मुझे कम-नज़र समझते हैं, असल में अंधे वे ख़ुद हैं जो मेरी गहराई को पहचान नहीं पा रहे।

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