एक शब ऐ जान-ए-जां घर में सहर बीजाईए — नज़ीर अकबराबादी

एक शब ऐ जान-ए-जां घर में सहर बीजाईए हाल पर बंदे के होगी मेहरबानी आप की

“One night, O soul of my soul, let dawn break within my home— upon this humble servant's plight your kindness would be shown.”

— नज़ीर अकबराबादी

अर्थ

ऐ मेरे प्राणों के प्राण, एक रात मेरे घर में सवेरा कीजिए; इस बंदे की दशा पर आपकी यही मेहरबानी होगी।

विस्तार

शायर अपनी महबूब से, जिसे वह अपनी जान की जान कहता है, एक कोमल और दिल से निकली गुज़ारिश कर रहा है। वह कहता है कि बस एक रात उसके घर में बिताइए, सुबह होने तक ठहरिए। अगर वह यह ख़्वाहिश पूरी कर दें, तो यह उस पर, उसके एक आशिक़ बंदे पर, सबसे बड़ी मेहरबानी होगी। यहाँ तड़प भी है और गहरा अदब भी। वह ज़िद नहीं करता, बस नरमी से मिन्नत करता है और महबूब की मौजूदगी को एक दुर्लभ इनायत मानता है। यह शेर इंतज़ार की पीड़ा और इस मीठी उम्मीद को बयान करता है कि शायद प्यार एक बार अपनी मौजूदगी में उदार हो जाए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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