ઘેલી બની મસ્ત ન નાથ ચાંપ્યો, લહાવો ન લીધો ઋતુનાં સુખોનો. સેતાર સારંગી મૃદંગ ચંગ, કાને વીણા સાંભળું ના ઉમંગ;

“Foolishly lost, I held not my love close, nor tasted pleasures that the season chose. Though sitar, sarangi, mridang, and chang, the veena's tune, no joy to me doth bring.”

— नर्मद
अर्थ

मूर्खतावश मैंने अपने प्रिय को गले नहीं लगाया और न ही ऋतुओं के सुखों का आनंद लिया। अब सितार, सारंगी, मृदंग, चंग और वीणा जैसे वाद्य यंत्रों को सुनकर भी मुझे कोई उमंग नहीं होती।

विस्तार

यह दोहा गहरे पछतावे की भावना व्यक्त करता है। वक्ता अफसोस करता है कि वह मूर्ख बन गया था या विचारों में खो गया था, जिसके कारण वह अपने प्रिय को सच्चे जुनून से गले लगाने और हर मौसम में मिलने वाले साधारण सुखों का आनंद लेने के अवसरों से चूक गया। यह पल में न जीने पर एक मार्मिक चिंतन है। अब, सितार, सारंगी, मृदंग, चंग और वीणा जैसे विभिन्न वाद्ययंत्रों की सुंदर ध्वनियाँ भी उनके कानों में कोई खुशी या उत्साह नहीं ला पाती हैं। दिल अतीत के पछतावों से इतना भारी है कि सबसे मधुर संगीत भी आत्मा को ऊपर नहीं उठा सकता।

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