“Seeing the river, brimming, full and grand,Why wouldn't the heart swell within the man?Hearing the water gurgle, flowing free,Why wouldn't one gently swayed be?”
एक भरी-पूरी नदी को देखकर मन विशाल और उदार क्यों न हो, और पानी की कलकल ध्वनि सुनकर व्यक्ति थोड़ा क्यों न विचलित हो।
यह दोहा हमें प्रकृति के गहरे प्रभाव पर विचार करने के लिए आमंत्रित करता है। यह पूछता है कि जब हम एक नदी को जीवन से भरपूर और पूरी तरह से बहते हुए देखते हैं, तो हमारा मन बड़ा, अधिक उदार और विशाल क्यों नहीं हो जाता? इसी तरह, जब हम पानी की शांत, लयबद्ध ध्वनि सुनते हैं जो धीरे-धीरे बह रही है, तो क्या हमें विनम्र नहीं होना चाहिए और सम्मान में थोड़ा झुकना नहीं चाहिए? यह कविता सुझाव देती है कि एक नदी की विशालता और शांति को देखने से स्वाभाविक रूप से हमारा मन विस्तृत होता है और विनम्रता तथा विस्मय की भावना पैदा होती है। यह हमें प्रकृति से जुड़ने और उसकी सुंदरता को अपने भीतर बड़प्पन और नम्रता विकसित करने देने की एक कोमल याद दिलाता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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