ભાગ્યમાં નહિ જેહ, રહે ચાલુ ક્યમ આખી? હવે રહ્યું છે એ જ, સ્હેજ જો છૂટવું મોતે;

“That which is not in fate, how can it last its course?Now only this remains, a slight release through death.”

— नर्मद
अर्थ

जो भाग्य में नहीं है, वह कैसे पूरा चलता रह सकता है? अब बस यही बचा है कि मृत्यु से थोड़ी मुक्ति मिल जाए।

विस्तार

यह दोहा भाग्य की गहरी भूमिका को दर्शाता है। यह विचारपूर्वक पूछता है, 'जो हमारे भाग्य में ही नहीं, जो हमारी नियति में लिखा ही नहीं, वह पूरी तरह कैसे चल सकता है या टिक सकता है?' यह बताता है कि जो चीज़ हमारे भाग्य में नहीं है, वह अंततः धीमी पड़ जाती है। दूसरी पंक्ति एक गहरा विचार प्रस्तुत करती है: 'अब बस वही बचा है, अगर कोई मौत की छाया से थोड़ी भी आज़ादी पाना चाहे।' इसका मतलब यह हो सकता है कि सच्ची मुक्ति, या जीवन के अंतिम छोर से थोड़ी-सी भी छूट, भाग्य को स्वीकार करने में ही है। यह भी हो सकता है कि हमारे सांसारिक मोह-माया की 'छोटी मृत्यु' ही हमें अपनी तय की गई नियति से ऊपर उठने में मदद करती है। यह स्वीकृति और हमारे अस्तित्व पर एक गहन चिंतन है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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