ज़िक्र-ए-बुतान सी पहली सी नफ़रत नहीं रही — मोमिन ख़ाँ मोमिन

ज़िक्र-ए-बुतान सी पहली सी नफ़रत नहीं रही कुछ अबतो कुफ़्र-ए-मोमिन-ए-दीन-दार कम हुआ

“For speaking of the idols, I no longer feel that old disdain— at last the pious believer's unbelief has waned a little.”

— मोमिन ख़ाँ मोमिन

अर्थ

बुतों के ज़िक्र से अब पहले जैसी नफ़रत नहीं रही; कुछ अब तो दीनदार मोमिन का कुफ़्र कम हो गया।

विस्तार

शायर अपने दिल का बदलाव कबूल करता है। पहले बुतों या हुस्न के ज़िक्र से भी उसे नफ़रत होती थी। लेकिन अब वह पुरानी नफ़रत नरम पड़ गई है। बड़े प्यारे अंदाज़ में वह कहता है कि उसके भीतर का सख़्त, अपने ईमान पर नाज़ करने वाला मोमिन अब थोड़ा कम कठोर हो गया है। उसकी पहले वाली सख़्ती या इनकार घट गया है। यहाँ एक गर्माहट और सच्चाई है, जैसे दिल खुल रहा हो, कठोर फ़ैसलों को छोड़कर हुस्न और मोहब्बत को बिना डर के अपना रहा हो। यह ख़ुद को पहचानने का एक नरम पल है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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