मेहमान 'मीर' मत हो ख़्वान-ए-फ़लक पे हरगिज़ — मीर तक़ी मीर

मेहमान 'मीर' मत हो ख़्वान-ए-फ़लक पे हरगिज़ ख़ाली ये मेहर-ओ-मह की दोनों रिकाबियाँ हैं

“Oh Meer, never become a guest upon the tavern of the sky; these two chambers of love and affection are empty.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मेहमान 'मीर', तुम कभी भी आकाश के मयखाने में मत आना; ये प्रेम और स्नेह के दोनों कमरे खाली हैं।

विस्तार

यह शेर एक गहरा तन्हाई भरा नज़ारा पेश करता है। शायर कह रहे हैं कि ऐ मेहमान! तू फ़लक के इस बड़े से मंच पर यूँ भटकना मत। क्योंकि प्यार की और चाँदनी की जो ये दोनों जगहें हैं.... ये खाली हैं। यह शेर हमें याद दिलाता है कि ज़िंदगी की रौनक और मोहब्बत की महफ़िल कितनी जल्दी वीरान हो जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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