शैख़ क्या सूरतें रहती थीं भला जब था दैर — मीर तक़ी मीर

शैख़ क्या सूरतें रहती थीं भला जब था दैर रू-ब-वीरानी हो इस का'बे की आबादी का

“What beauty resided here when the shrine was alive, The desolation of this Kaaba's population now.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

शायर पूछ रहा है कि जब यह काबा का तीर्थ स्थल जीवित था, तो यहाँ किस प्रकार की सुंदरता रही होगी, क्योंकि अब यहाँ बस वीराने की आबादी बची है।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ का'बे की बात नहीं कर रहा है, मेरे दोस्तों। यह तो वक़्त के चक्र की बात है। मिर्ज़ा तक़ी मीर यहाँ एक गहरे सवाल से गुज़र रहे हैं—कि जब कोई चीज़ अपनी रौनक खो देती है, जब वह वीराने में होती है, तो उसकी असली पहचान क्या होती है? यह एक बहुत ही दार्शनिक नज़रिया है, जो हमें सिखाता है कि हर ऊँचाई के बाद एक गिरावट ज़रूर आती है।

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