ये मंसूर का ख़ून-ए-नाहक़ कि हक़ था
क़यामत को किस किस से ख़ूँदार होगा
“The blood of Mansur, which was unjust, held rights; From whom will the Day of Judgment draw its blood?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
ये मंसूर का ख़ून-ए-नाहक़ कि हक़ था, यानी मंसूर का यह अन्यायपूर्ण रक्त अधिकार था; क़यामत को किस किस से ख़ूँदार होगा, यानी कयामत को किससे रक्त प्राप्त होगा।
विस्तार
यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब ने लिखा है, और यह अन्याय के उस गहरे दाग की बात करता है। शायर कहते हैं कि मंसूर का ख़ून-ए-नाहक़... यानी जो ख़ून बेवजह बहाया गया... वो इतना बड़ा दाग है कि क़यामत के दिन भी, उसे साफ़ करना बहुत मुश्किल होगा। यह अन्याय की शाश्वतता को दर्शाता है।
