'मीर'-साहिब भी उस के हाँ थे लेक बंदा-ए-ज़र ख़रीदा के मानिंद

“Even Meer Sahib, who was once in his embrace, / Has bought the man like a piece of gold.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

मीर साहब भी उस के हाँ थे लेक बंदा-ए-ज़र ख़रीदा के मानिंद अर्थात, मीर साहब भी उस के आँचल में लेटे हुए बंदे-ए-ज़र की तरह खरीद लिए गए हैं।

विस्तार

इस शेर में शायर एक बहुत गहरा दर्द बयां कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि महबूब की हाँ, उसका मान जाना, कोई दिल से निकली बात नहीं है। यह तो किसी चीज़ की तरह है जिसे खरीदा जा सके। यह इश्क़ की नज़ाकत नहीं, बल्कि एक सौदा है। शायर ने इस बात पर तंज कसा है कि प्यार में भी अब वफ़ा और ईमानदारी कहाँ बची है।

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