“Having wandered far from the mosque, from the struggle for the head, My stature has become like an arch, having passed through prostration.”
हम सर-कशी से मुद्दतों मस्जिद से बच-बच कर चले, अब सज्दे ही में गुज़रे है क़द जो हुआ मेहराब सा। (अर्थात, मैं बहुत समय तक सिर-कशी और मस्जिद से दूर भटकता रहा, लेकिन अब मेरा क़द (कद) सज्दे में गुज़रने से मेहराब जैसा हो गया है।)
यह शेर एक गहरे आध्यात्मिक सफ़र और बदलाव के एहसास को बयान करता है। शायर कहते हैं कि पहले वह बड़ी-बड़ी गलियों और मस्जिद से बचते-बचते गुज़रे थे। लेकिन अब, उनकी क़द (कद) उस सज्दे की जगह से गुज़रती है, जो एक मेहराब जैसा है। यह एहसास कराता है कि आस्था के सबसे निजी और विनम्र पल ही सबसे ज़्यादा बदलाव और समर्पण का अनुभव कराते हैं।
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
