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गुल शर्म से बह जाएगा गुलशन में हो कर आब सा बुर्के से गर निकला कहीं चेहरा तिरा महताब सा

Like a rose that would scatter in the garden with the rain, Your face, like the full moon, if it ever emerges from your veil.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

गुल की तरह शर्म से गुलशन में बिखर जाएगा, जब तुम्हारा चेहरा पर्दे से निकलकर चाँद जैसा हो।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब की बेमिसाल तारीफ़ है, जो खूबसूरती के अचानक प्रकट होने का वर्णन करता है। शायर कहते हैं कि अगर गुलाब की महक पानी की तरह बाहर आ जाए, तो पूरा गुलशन शर्म से बह जाएगा। और ये तो बस शुरुआत है... जब आपका चेहरा, चाँद की तरह, अपने पर्दे से झाँकेगा, तो यह पूरी कायनात चकाचौंध हो जाएगी। यह एक ऐसी अलौकिक सुंदरता की बात है जो क़ैद नहीं की जा सकती।

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