खुला नशे में जो पगड़ी का पेच उस की 'मीर' — मीर तक़ी मीर
“The turban's knot, undone by intoxication, that of Mir, On the ocean of grace, another sorrow has appeared.”
अर्थ
खुला नशे में जो पगड़ी का पेच उस की 'मीर', समंद-ए-नाज़ पे एक और ताज़ियाना हुआ। (अर्थात, मीर की पगड़ी का नशा में खुल जाना, और नज़ाकत के सागर पर एक और दुखद घटना घटित होना।)
विस्तार
यह शेर इश्क़ की उस मदहोशी को बयान करता है, जहाँ ग़म और नशा एक हो जाते हैं। शायर कहते हैं कि मेरी पगड़ी का पेच भी नशे में खुला हुआ है, मतलब मेरा होश ठिकाने पर नहीं है। और यह ग़म... यह ग़म इतना गहरा है कि जैसे महबूब के नाज़ की समंदर में एक और मौत (तज़ियाना) आ गई हो! यह इश्क़ का वो आलम है, जहाँ ज़िन्दगी और मौत का फ़र्क़ मिट जाता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
