सद गुलिस्ताँ ता-यक बाल थे उस के जब तक
ताइर-ए-जाँ क़फ़स-ए-तन का गिरफ़्तार न था
“The garden was so lovely, until his hair was youthful, When the bird of the soul was not captive in the cage of the body.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
जब तक उसके बाल सद गुलिस्ताँ जितने खूबसूरत थे, तब तक वह समय था जब आत्मा का पक्षी शरीर के पिंजरे में कैद नहीं था।
विस्तार
मिर्ज़ा तक़ी मीर ने इस शेर में इंसान के जीवन की एक गहरी कड़वाहट बयान की है। वह कहते हैं कि ज़िन्दगी, जो शुरू में एक गुलिस्तान जैसी लगती है, जब आत्मा खुद को शरीर के क़फ़स में क़ैद कर लेती है, तो उसकी प्राकृतिक चमक चली जाती है। यह एक बहुत ही ख़ूबसूरत शिकायत है... कि कैसे हमारी आत्मा अपनी आज़ादी खो देती है।
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