जूँ सुब्ह अब कहाँ है तूल-ए-सुख़न की फ़ुर्सत क़िस्सा ही कोई दम को है मुख़्तसर हमारा

“Where is the leisure now for the pen of poetry, in the morning? Our story is merely brief, lasting but a moment.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

जूँ सुबह अब कहाँ है तूल-ए-सुख़न की फ़ुर्सत। किस्सा ही कोई दम को है मुख़्तसर हमारा। (अर्थ: सुबह का समय अब कहाँ है जब साहित्य के पेन को फुर्सत मिले? हमारा किस्सा तो बस एक पल का है, संक्षिप्त है।)

विस्तार

यह शेर एक कलाकार की मजबूरी और विवशता को बयां करता है। शायर कह रहे हैं कि अब न तो कविता के लिए समय है, और न ही वह कहानी जो उन्हें कहनी है, वह पूरी है। ज़िंदगी का सफ़र ही इतना छोटा हो गया है कि बड़े-बड़े किस्से कहना भी मुमकिन नहीं रहा। यह वक़्त की पांसा में खो जाने का दर्द है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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