क्या है जो उठ गया है पर बस्ता-ए-वफ़ा है — मीर तक़ी मीर

क्या है जो उठ गया है पर बस्ता-ए-वफ़ा है क़ैद-ए-हयात में है तू 'मीर' आ रहेगा

“What is it that has risen, but the scroll of loyalty remains, In the captivity of life, you 'Mir', will be present.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

क्या है जो उठ गया है, पर वफ़ा का बस्ता अभी भी है। तू 'मीर', जीवन की कैद में आ रहेगा।

विस्तार

ये शेर मिर्ज़ा ग़ालिब के उस एहसास को बयां करता है जब ज़िंदगी बहुत मुश्किल लगे। शायर पूछते हैं कि आखिर वो कौन सी चीज़ है, जो हमारे जीवन में उठ आई है, लेकिन हमारा वफ़ा का बस्ता अभी भी सलामत है? वह यकीन दिलाते हैं कि चाहे ज़िंदगी की क़ैद कितनी भी हो.... आप वापस ज़रूर आओगे। यह वफ़ा की उस अटूट डोर का इज़हार है, जो हर तूफ़ान से गुज़र जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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