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बे-शर्म महज़ है वो गुनहगार जिन ने 'मीर' अब्र-ए-करम के सामने दामाँ तर किया

Truly shameless are those sinners who stretched out their hands Before the curtain of grace, that is the crime of Meer.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

बे-शर्म महज़ वो गुनहगार हैं जिन्होंने 'मीर' ने कृपा के पर्दे के सामने अपने हाथ फैलाए।

विस्तार

मीर तक़ी मीर साहब कहते हैं कि बे-शर्म महज़ वो गुनहगार हैं.... जो बड़े से बड़े एहसान या मेहरबानी के सामने भी अपना लिहाज़ या अपना दामाद फैला दें। यह शेर एक बहुत गहरी बात कहता है— कि इंसान को कभी भी किसी के सामने अपनी ज़रूरत का एहसास नहीं कराना चाहिए। यह स्वाभिमान की बात है।

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