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'मीर' किस को अब दिमाग़-ए-गुफ़्तुगू उम्र गुज़री रेख़्ता छूटा गया

Meer, to whom now should I converse my mind? My life has passed, and a mere fragment has slipped away.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मीर (शायर) अब किसके साथ अपनी बातें करना चाहता है? उसका जीवन बीत गया है, और बस एक छोटा सा टुकड़ा रह गया है।

विस्तार

यह शेर समय के गुजर जाने और जीवन की नश्वरता पर एक गहरा चिंतन है। शायर कहते हैं कि अब जीवन की वो सारी बातें, वो बातें करना, वो दिमाग़ की गुफ़्तुगू... इन सब का कोई मोल नहीं बचा। एक धागा, एक मौका, जीवन का कोई ख़ूबसूरत लम्हा... वो हाथ से फिसल गया। यह शेर एक ऐसी उदासी बयां करता है जो समय के साथ आती है, एक ख़ामोश इकरार-ए-फ़िराक़!

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