जों सुब्ह इस चमन में न हम खुल के हँस सके
फ़ुर्सत रही जो 'मीर' भी सो यक-नफ़स रही
“Oh, how we cannot laugh freely in this garden, even if 'Mir' had just a moment's leisure.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
आज सुबह इस बगीचे में हम खुलकर हँस नहीं सकते, अगर मीर को भी थोड़ा सा समय मिल जाए।
विस्तार
यह शेर उस बेचैनी को बयां करता है जब इंसान अपनी असली ख़ुशी नहीं जी पाता। शायर कहते हैं कि यह ज़िंदगी का 'चमन' है, लेकिन यहाँ खुल कर हँसना मुमकिन नहीं। वह बस एक पल की 'फ़ुर्सत' चाहता है—बस एक साँस की आज़ादी। यह एहसास बहुत गहरा है, कि कैसे ज़िंदगी की भाग-दौड़ में अपनी ख़ुद की मुस्कान कहीं खो जाती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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