नश-मुर्दा मिरे मुँह से याँ हर्फ़ नहीं निकला — मीर तक़ी मीर
“From my mouth, not even a single syllable of intoxication or falsehood emerged; what I spoke, 'Mir', was purely calculative (logical).”
अर्थ
नशे या मूर्खता के कारण मेरे मुख से कोई अक्षर नहीं निकला; जो बात मैंने कही, 'मीर', वह पूरी तरह से गणना पर आधारित थी।
विस्तार
यह शेर भावनाओं और विचार के बीच के बहुत बारीक अंतर को समझाता है। मीर तक़ी मीर कहते हैं कि मेरे मुँह से जो बातें निकलती हैं, वो न तो नश से हैं और न ही पागलपन से। ये तो बस एक हिसाब-किताब का नतीजा हैं। इसका मतलब है कि शायर की हर बात, हर लफ्ज़, सोच-समझकर, तक़लीफ़ से निकलती है। यह कला की गहराई को दर्शाता है।
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