उन दरस-गहों में वो आया न नज़र हम को — मीर तक़ी मीर
“In those glances, he did not appear to us, How can I imitate the beauty of a bookish face?”
अर्थ
उन दरस-गहों में वह नज़र नहीं आया हम को, मैं उस किताबी चेहरे की ख़ूबी क्या नक़ल करूँ।
विस्तार
मिर्ज़ा तक़ी मीर यहाँ एक बहुत ही गहरी बात कह रहे हैं। शायर कहते हैं कि वो महबूब हमारी साधारण, आम ज़िंदगी में कभी आया ही नहीं। इसलिए, वो उस 'किताबी' (किताबों जैसा) चेहरे की ख़ूबसूरती को नक़ल कैसे करें? यह शेर बताता है कि कुछ ख़ूबसूरत चीज़ें या एहसास इतने ऊंचे होते हैं कि उन्हें अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतारना या दोहराना नामुमकिन होता है।
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