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तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था
बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

As if in the passion of passing through the streets, a peacock was there, In the desert, we paid homage to the dust of 'Mir'.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

तुम्हारे रास्ते के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था, बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा ग़ालिब की तरह, एक गहरी तन्हाई को बयां करता है। शायर कहते हैं कि महबूब का रास्ता कितना भी रंगीन क्यों न हो, वो तो बस एक दिखावा था, एक बगुलों जैसा नज़ारा। लेकिन जब वो ज़िंदगी के रेगिस्तान में पहुँचते हैं, तो उन्हें महबूब नहीं, बल्कि अपने ही ग़मों का गुबार मिलता है। यह शायरी का सबसे गहरा सच है—कि सुकून हमें कहीं और नहीं, अपनी यादों और अपनी शायरी में मिलता है।

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