नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की

“What shall I say of the tenderness of the sun's face, in the night of the moon, / That it had brought a burning intensity to the garden, step by step.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैं सूरज के चेहरे की कोमलता के बारे में क्या कहूँ, जो चाँद की रात में थी, / कि वह बाग तक कदम-कदम करके गर्मी लेकर आया था।

विस्तार

यह शेर किसी एहसास की अतिशयता को बयां करता है। शायर पूछते हैं कि सूरज की तेज़ नज़ाकत, चाँदनी रात में कैसे हो सकती है। यह बात इतनी ज़ोरदार थी, इतनी असरदार थी.... कि शायर को लगा कि उसे बाग़ में घूमना ही पड़ेगा। यह एक विरोधाभासी प्रेम है, एक जुनून जो समय और माहौल की परवाह नहीं करता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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