“Oh, I will not bring the crown of the king to your head, I have the turban of Namad, the devoted fakir.”
ऐ ताज-ए-शह न सर को फ़रव लाऊँ तेरे पास, है मो'तक़िद फ़क़ीर नमद की कुलाह का। (अर्थात्, मैं राजा का ताज तुम्हारे सिर पर नहीं लाऊँगा, क्योंकि मेरे पास तो एक समर्पित फ़क़ीर, नमाद की पगड़ी है।)
यह शेर शायर की आध्यात्मिक समझ और विनम्रता को दर्शाता है। शायर राजा से कह रहे हैं कि, 'ऐ ताज-ए-शह, मैं इसे तुम्हारे सिर पर नहीं लाऊँगा।' यहाँ शायर सांसारिक सत्ता (ताज) और आध्यात्मिक ज्ञान (नमद की कुलाह) के बीच का अंतर बता रहे हैं। कुलाह, यानी सादगी और इल्म, किसी भी ज़मीनी तख़्त से कहीं ज़्यादा कीमती है।
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