आह-ए-ता-चंद रहो ख़ानकाह-ओ-मस्जिद में — मीर तक़ी मीर

आह-ए-ता-चंद रहो ख़ानकाह-ओ-मस्जिद में एक तो सुब्ह-ए-गुलसिताँ में भी शाम करो

“Oh, stay in the Khanqah and the mosque with a sigh, Make the evening happen even in the morning garden's sight.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

आह-ए-ता-चंद के साथ खानकाह और मस्जिद में रहो, और सुबह के गुलसिताँ में भी शाम का अनुभव करो।

विस्तार

यह शेर हमें रूहानी सुकून की बात कहता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि ज़िंदगी को ख़ानक़ाह और मस्जिद में गुज़ारो। इसका मतलब क्या है? मतलब ये कि जब आपकी रूह किसी इबादत और इश्क़ में मसरूर हो जाए.... तो उस खुशी का एहसास इतना गहरा होता है कि आपको सुबह की तरोताज़गी में भी शाम जैसा सुकून मिल जाता है। ये एक स्थाई सुकून की बात है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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