यूँ ही हैरान-ओ-ख़फ़ा जों ग़ुंचा-ए-तस्वीर हों — मीर तक़ी मीर

यूँ ही हैरान-ओ-ख़फ़ा जों ग़ुंचा-ए-तस्वीर हों उम्र गुज़री पर न जाना मैं कि क्यूँ दिल-गीर हों

“How are the buds of the picture so surprising and displeasing to the eye? I don't know why, even after a lifetime, my heart is drawn to them.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

ये तस्वीर के फूल (या कलियाँ) यूँ ही हैरान और नाराज़ करने वाले क्यों हैं? मैंने नहीं जाना कि जीवन भर गुज़र जाने पर भी मेरा दिल इन्हें क्यों चाहता है।

विस्तार

यह शेर प्यार की उस अजीब और उलझी हुई कशमकश को बयां करता है। शायर कह रहे हैं कि कभी-कभी बस एक छोटा-सा नज़ारा, एक तस्वीर का गुच्छा.... इतना हैरान और परेशान कर देता है। यह तो ज़िन्दगी भर गुज़र जाने के बाद भी, यह समझ नहीं आता कि हमारा दिल आज भी क्यों इतना दीवाना है! यह अहसास है कि मोहब्बत कितनी अनिश्चित और गहरी होती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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