“From Bali, a hand of craving, since birth has been given, To whom shall one spread out the plea, if that which is one's own is gone?”
बालीं पे सर इक उम्र से है दस्त-ए-तलब का, जो है सो गदा किस कने जा हाथ पसारें। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जन्म से ही एक इच्छा या लालच का हाथ है, और जो चीज़ अपनी है, उसे माँगने के लिए किस पास हाथ फैलाएँ।
यह शेर एक गहरे और जीवन भर चले आ रहे तलब (craving) को बयां करता है। शायर कहते हैं कि उनका जीवन एक खास चाहत में बंधा हुआ है। और दूसरी लाइन में वह सवाल करते हैं—कि अगर यह तलब ही उनका अस्तित्व है, तो वह इसे पूरा करने के लिए और कहाँ हाथ फैलाएँ? यह एक ऐसी बेचैनी है जो रूह में बस जाती है, एक अनजानी, मगर गहरी तड़प।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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