बद कहा मैं ने रक़ीबों को तो तक़्सीर हुई — मीर तक़ी मीर

बद कहा मैं ने रक़ीबों को तो तक़्सीर हुई क्यूँ है बख़्शो भी भला सब में बुरा मैं ही हूँ

“How did I speak to my rivals, criticizing them? / Why am I the one who speaks ill of all, even when given favors?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मैंने अपने विरोधियों को बुरा-भला क्या कहा, कि मेरी आलोचना हुई? फिर भी, जब सब में भला किया जाता है, तो बुरा मैं ही हूँ।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर की ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई को बयां करता है। शायर कहते हैं कि जब हमने दूसरों की निंदा की, तो हमें बदनामी झेलनी पड़ी। लेकिन असली दर्द तो दूसरे मिसरे में है—कि जब हम सबके लिए भला सोचते हैं, तब भी लोग हमें बुरा क्यों समझते हैं? यह एक बहुत गहरा सवाल है... कि क्या हमारी नीयतें कभी भी पूरी तरह समझी जाती हैं?

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