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जोर-ए-सिपहर-ए-दूँ से बुरा हाल था बहुत मैं शर्म-ए-ना-कसी से ज़मीं में समा गया

The condition was worse than the morning's glow, I was buried in the shame of having no show.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

अर्थात्, मैं उस स्थिति में था जो सुबह की आभा से भी बदतर थी; मुझे अपनी किसी उपस्थिति के न होने के शर्म से ज़मीन में समा गया।

विस्तार

यह शेर इंसान की आंतरिक बेचैनी और शर्म की उस भावना को बयां करता है, जो कभी-कभी सबसे बड़ी सज़ा बन जाती है। शायर कहते हैं कि सुबह की पहली किरण का जोर तो झेलना आसान है.... लेकिन एक ऐसी शर्म, जो किसी वजह से न हो और किसी वजह से न हो.... उस शर्म के आगे तो ज़मीन में समा जाना ही बेहतर है! यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि मन की एक गहरी उलझन है।

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