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दिलकश ऐसा कहाँ है दुश्मन-ए-जाँ मुद्दई है मुद्दआ है इश्क़

Where can I find a beloved like this, O enemy of my soul? Whether calling or being called, it is the love.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

दिलकश जैसा कोई कहाँ है, ऐ जान के दुश्मन। चाहे मुद्दई हो या मुद्दआ, सब इश्क़ ही है।

विस्तार

यह शेर प्रेम की उस खतरनाक और नशीली दुनिया को बयान करता है। शायर पूछ रहे हैं कि दिल को लुभाने वाला ऐसा दुश्मन कहाँ मिलेगा? यह दुश्मन कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि इश्क़ की अपनी ज़िद है। और दूसरी लाइन में ये कहा गया है कि दावेदार (मुद्दई) और जिसकी माँग है (मुद्दआ) दोनों ही इश्क़ के नाम पर एक-दूसरे से टकरा रहे हैं।

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