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ख़िज़्र उस ख़त्त-ए-सब्ज़ पर तो मुआ
धुन है अब अपने ज़हर खाने की

Khizr, upon that green scroll, is now so keen The tune of consuming one's own poison, unseen.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

खिज़्र उस हरे कागज़ पर तो मुआ है, अब अपने ज़हर खाने की धुन।

विस्तार

यह शेर एक आत्म-स्वीकृति है, एक गहरा दर्द! शायर कहते हैं कि बाहरी दुनिया में कितना भी मोहक रास्ता क्यों न हो—ख़त्त-ए-सब्ज़—तो हमारा मन कहीं और ही उलझा है। हमारा ध्यान अब किसी और चीज़ पर नहीं है.... बल्कि बस अपने ज़हर को पी जाने की धुन में है। यह उस दर्द का इज़हार है जो अंदर ही अंदर हमें खा रहा है।

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