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रोज़ शब गुज़रे है पेच-ओ-ताब में रहते तुझे दिल-ए-सद-चाक किस की ज़ुल्फ़ का तू शाना था

Every day and night, you have lived in a tangle of entanglements, O you heart. To whose tresses were you once so graceful, O heart of a hundred sighs?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

हर दिन और हर रात, तू पेच और ताल में रहता है। ऐ सौ साँसों के दिल, तू किसकी ज़ुल्फ़ का कभी शोख़ था।

विस्तार

यह शेर इश्क़ की उस बेचैनी को बयां करता है, जहाँ वक़्त का गुज़रना भी महबूब के नशा में खोया रहता है। शायर कहते हैं कि दिन और रात दोनों बस उसी के जादू में गुज़र जाते हैं। और दूसरी लाइन में वह अपने दिल से पूछते हैं कि ये दिल किस की ज़ुल्फ़ों से सजा था? यह एक सवाल है.... जो दिल के भटकने और बे-मालूम हो जाने का एहसास दिलाता है।

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