“The destination was that beloved, my friend, who for ages, Now the heart is like a mourning hall of a long period.”
मंज़िल उस मह की रही जो मुद्दतों ऐ हम-नशीं, अब वो दिल गोया कि इक मुद्दत का मातम-ख़ाना था। इसका शाब्दिक अर्थ है कि मंज़िल तो वह महबूब था, ऐ हम-नशीं, जो युगों से मेरे साथ था, और अब मेरा दिल ऐसा है जैसे वह किसी लंबे समय के शोक का स्थान हो।
मिर्ज़ा मिर्ज़ा तक़ी मीर ने यहाँ बिछड़ने के दर्द को बड़ी खूबसूरती से बयान किया है। शायर कहते हैं कि महबूब का महीना ही हमारी मंज़िल थी, जो हमें सदियों तक लगती रही। लेकिन अब दिल तो किसी ऐसे मातम-ख़ाने जैसा हो गया है, जहाँ हर पल बस गम ही है। यह एहसास है कि इश्क़ की राह भले ही लंबी थी, पर अब उस मंज़िल का खो जाना एक अथाह ग़म बन गया है।
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