लगा करने हिज्रान सख़्ती से सख़्ती
ख़ुदा जाने क्या आख़िर-ए-कार होगा
“With the severity of separation, how harsh is the test, God knows what the ultimate fate will be.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
विरह की सख़्ती से सख़्ती क्या है, खुदा जाने आख़िर-ए-कार क्या होगा।
विस्तार
ये शेर उस गहरे दर्द और उस हिम्मत की बात करता है जो हम दिल में समेट लेते हैं। शायर कह रहे हैं कि हम विरह की सख़्ती से सख़्ती से जंग लड़ लेंगे, लेकिन अंत में क्या होगा, इसका अंदाज़ा लगाना भी मुमकिन नहीं। यह एहसास है कि इंसान अपनी पूरी कोशिश कर सकता है, पर किस्मत का लिखा कुछ भी नहीं रोक सकता। बहुत ही गहरा तसव्वुर है!
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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