'मीर' साहब भी उस के हाँ थे पर — मीर तक़ी मीर
'मीर' साहब भी उस के हाँ थे पर
जैसे कोई ग़ुलाम होता है
“Even 'Mir' sahib was in his favor, but Like a servant he is.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
मीर साहब भी उसका पक्ष लेते थे, लेकिन वह एक गुलाम की तरह है।
विस्तार
यह शेर एक बहुत गहरे दर्द को बयां करता है। शायर कहते हैं कि मिर्ज़ा साहिब जैसे महान शायर भी उस महबूबा के सामने बस एक ग़ुलाम बनकर रह जाते हैं। यह दिखाता है कि इश्क़ की ताकत कितनी बड़ी होती है! हमारी मर्ज़ी, हमारी शायरी, सब उसके आगे बेबस हो जाते हैं। यह समर्पण की बात है, एक अजीब सी मजबूरी की।
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