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मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं

Do not know us, for the sky wanders for ages, When humans emerge from the curtain of dust.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

शायर कह रहा है कि हमें मत जानना, क्योंकि यह आकाश युगों-युगों से भटकता है, और इंसान तो धूल के पर्दे से निकलते हैं।

विस्तार

यह शेर न सिर्फ़ एक बात कहता है, बल्कि जीवन का एक गहरा दर्शन है। शायर हमें याद दिला रहे हैं कि भले ही हम दुनिया में बड़े-बड़े सपने देखें, या बड़े-बड़े मुसाफ़िर की तरह भटकें, लेकिन हमारी जड़ें मिट्टी में हैं। हम ख़ाक के ही बच्चे हैं। यह एहसास हमें नम्रता सिखाता है। यह बताता है कि इंसान की असल पहचान उसके भौतिक अस्तित्व से है, न कि उसकी कल्पनाओं से।

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