“Whenever someone uttered your name before me, I held fast to this bruised, tormented heart.”
जब भी किसी ने मेरे सामने तुम्हारा नाम लिया, तो मैंने अपने इस पीड़ित और सताए हुए दिल को बार-बार थामकर संभाला।
मीर साहब ने यहाँ उस बेबस और नाज़ुक लम्हे को बयां किया है जब किसी महफ़िल में अचानक महबूब का नाम गूंज उठता है। उनका दिल पहले ही इश्क़ की चोटों से चूर यानी 'सितम-ज़दा' है, और उस नाम की आहट पाते ही वह इतनी शिद्दत से तड़पने लगता है कि उसे बार-बार हाथों से थामना पड़ता है। यह शेर दिखाता है कि पुराना दर्द कभी पूरी तरह नहीं सोता, बस एक नाम की दस्तक ही उसे फिर से जगाने के लिए काफ़ी होती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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