मैं सैद-ए-नातवाँ भी तुझे क्या करूँगा याद
ज़ालिम इक और तीर लगाया तो क्या हुआ
“Even if I, the lord of praises, forget you, what harm would it do? If the cruel one strikes with yet another arrow, what difference would it make?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
अगर मैं, जो नज़्में लिखने का माहिर हूँ, तुझे याद भी नहीं करूँगा, तो क्या होगा? ज़ालिम, अगर तू एक और तीर मारेगा, तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा।
विस्तार
यह शेर दर्द और विस्मरण के विरोधाभास को दिखाता है। शायर कहते हैं कि मैं तो वो हूँ जो भुलाने में माहिर है.... फिर भी, आपको याद करना मेरे बस में नहीं। यह एक अजीब सी उलझन है! और जब वह कहते हैं कि ज़ालिम, एक और तीर लगा दो तो क्या हुआ? तो यह हार नहीं है, बल्कि एक तरह का इक़रार है... कि अब दर्द सहने की आदत हो चुकी है।
Comments
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
