शर्म-ओ-हया कहाँ तक हैं 'मीर' कोई दिन के अब तो मिला करो तुम टुक बे-हिजाब हो कर

“Oh Meer, where do your modesty and shyness end? On some day, please meet us, you who are unveiled.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

मीर, तुम्हारी शर्म और हिजाब की सीमा कहाँ तक है? किसी दिन तो मिलो, जो बे-हिजाब हो।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ एक शिकायत नहीं है, बल्कि एक गहरा सामाजिक अवलोकन है। मीर साहब कहते हैं कि आज के दौर में शर्म और हया जैसी चीज़ें कहाँ खो गई हैं! लेकिन ये सिर्फ़ सवाल नहीं कर रहे हैं.... बल्कि एक चुनौती दे रहे हैं। वो अपनी महबूबा से कहते हैं कि अब तो मिलो.... ऐसे मिलो, जैसे कोई परदे में नहीं है। यह चाहत और समाज के बीच के संघर्ष को दिखाता है।

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