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गए उन क़ाफ़िलों से भी उठी गर्द
हमारी ख़ाक क्या जानें कहाँ है

Even from those caravans, dust arose; What do they know of our ashes, where they are?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

उन क़ाफ़िलों से भी धूल उठी, हमारी राख का उन्हें क्या ज्ञान होगा, कि वह कहाँ है।

विस्तार

यह शेर जीवन के गूढ़ रहस्य और विरह की गहराई को बयां करता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि जो ख़ाक (राख) है, वो इतनी अनजानी है कि उसे जानने की क्षमता उस धूल में भी नहीं है जो गुज़रते क़ाफ़िलों से उठी है। यह एक गहरा चिंतन है... कि कुछ दर्द और कुछ यादें इतनी बड़ी होती हैं कि दुनिया उन्हें कभी समझ नहीं पाती।

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