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बे-सुध पड़ा रहूँ हूँ उस मस्त-ए-नाज़ बिन मैं
आता है होश मुझ को अब तो पहर पहर में

Without that intoxicated lover, I remain unconscious; My senses return to me only every few hours.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैं अपनी उस नाज़ों-नख़रों वाली महबूबा के बिना बेसुध पड़ा रहता हूँ। अब मुझे होश भी बस कभी-कभी, पहरों के अंतराल पर ही आता है।

विस्तार

यह शेर उस नशे की हालत को बयां करता है, जो महबूब के जादू में खो जाने से होता है। शायर कह रहे हैं कि वो उस प्यारे, नटखट महबूब के बिना बेसुध पड़े हुए हैं। और जो होश उन्हें आता भी है, वह भी एक पल में नहीं, बल्कि पूरे-पूरे पहर-पहर में आता है। यह एहसास बहुत दर्दनाक होता है—जैसे आप किसी नशा छोड़कर धीरे-धीरे ज़मीन पर आ रहे हों।

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