हमारी क़ब्र पे क्या एहतियाज-ए-अम्बर-ओ-ऊद सुलग रहा है हर इक उस्तुख़्वाँ अगर की तरह

“What need of ambergris and aloeswood upon my grave? Each bone of mine smolders like incense still.”

— मीर अनीस
अर्थ

हमारी क़ब्र पर अम्बर और ऊद जैसी सुगंध की क्या ज़रूरत है, जब हमारी हर एक हड्डी अगरबत्ती की तरह खुद ही सुलग रही है।

विस्तार

यहाँ शायर अपनी मोहब्बत की उस दहकती हुई आग की बात कर रहा है, जो मौत के बाद भी ठंडी नहीं हुई। क़ब्रों पर अमूमन खुशबू के लिए अंबर और ऊद जैसी कीमती सुलगने वाली लकड़ियाँ जलाई जाती हैं, लेकिन आशिक कहता है कि उसकी मज़ार को इसकी कतई ज़रूरत नहीं। जुदाई और इश्क़ की पुरानी तपन से उसकी एक-एक हड्डी अगरबत्ती की तरह खुद-ब-खुद सुलग रही है, जिससे उसकी पूरी क़ब्र ही मोहब्बत की एक मुक़द्दस खुशबू में डूबी हुई है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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