“If no struggle remains in those who are drowning,Then what is this storm-like tumult passing over the ocean?”
अगर डूबने वालों में तड़प शेष नहीं रहती, तो फिर यह तूफ़ान जैसा क्या है जो सागर पर से गुज़र जाता है?
यह ख़ूबसूरत शेर हमें सोचने पर मजबूर करता है। यह पूछता है कि अगर डूबने वालों में कोई तड़प, कोई संघर्ष या जीने की चाहत बाकी नहीं रहती, तो फिर समंदर पर यह तूफ़ान जैसा क्या गुज़रता है? यह सूक्ष्मता से बताता है कि शायद दुनिया में हम जो उथल-पुथल या जीवन में आने वाले तूफ़ान देखते हैं, वे कहीं न कहीं हमारी अपनी आंतरिक स्थिति, हमारी 'जीने की इच्छा' या हमारी 'उम्मीद' से जुड़े हैं। अगर हम वाकई अपनी सारी तड़प छोड़ दें, तो फिर हमारे आसपास यह हंगामा क्यों है? यह एक गहरा विचार है, जो संकेत देता है कि हमारी आंतरिक लड़ाईयाँ और इच्छाएँ बाहरी दुनिया के नाटक में प्रतिध्वनित हो सकती हैं।
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