“Mariz, how can a drunkard's plight ever mend?When even his advisor laughs at vows he can't transcend.”
मरीज़, ऐसे शराबी की दशा भला कैसे सुधर सकती है, जिसकी तौबा (पश्चाताप) पर सीख देने वाला भी हँसता है।
यह शेर एक ऐसे शख्स की तस्वीर पेश करता है जो किसी बुरी आदत, खासकर शराबनोशी में इस कदर जकड़ा हुआ है कि उसका सुधरना नामुमकिन लगता है। 'मरीज़' पूछते हैं कि ऐसे शराबी की हालत भला कैसे सुधर सकती है, जिसकी तौबा पर यानी शराब छोड़ने की कसमो पर, उसे नसीहत देने वाले भी हंसते हैं। यह दिखाता है कि उस शख्स ने इतनी बार शराब छोड़ने की कसमें खाई हैं और तोड़ी हैं कि अब कोई भी उसकी ईमानदारी पर यकीन नहीं करता। शायर कहते हैं कि जब नेक सलाह देने वाले भी बदलाव की कोशिशों पर विश्वास खो दें, तो ऐसे व्यक्ति के लिए सुधार का रास्ता बेहद कठिन हो जाता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
